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छात्र जीवन में टीबी से जुड़ी चुनौतियों को मात देकर आज टीबी पीड़ितों की सेवा में जुटे हैं दामोदर

- मजबूत हौसले के दम पर टीबी रोग से जुड़ी दोहरी चुनौतियों को दी मात  - टीबी उन्मूलन के लिये कार्यरत सरकारी विभाग से जुड़ कर कर रहे हैं लोगों ...

- मजबूत हौसले के दम पर टीबी रोग से जुड़ी दोहरी चुनौतियों को दी मात 

- टीबी उन्मूलन के लिये कार्यरत सरकारी विभाग से जुड़ कर कर रहे हैं लोगों की जरूरी मदद 


अररिया।
सहरसा कॉलेज सहरसा से बीएससी ऑनर्स की पढ़ाई के दौरान एक दिन कुछ शारीरिक परेशानी महसूस हुई। कुछ दिन बीमार पड़ा रहा।फिर एक दिन मुंह से खून आना शुरू हो गया। बुखार था कि छूटने का नाम नहीं ले रहा था। अंदर से काफी घबराहट होने लगी तो गांव के एक झोला छाप डॉक्टर के पास इलाज के लिये पहुंचा। ठीक नहीं होने पर इलाज कराने पूर्णिया के एक निजी क्लिनिक पहुंचा। तमाम तरह की जांच के बाद चिकित्सक ने मुझे बताया कि आपको फेफड़े की टीबी है।छात्र जीवन के उन दिनों को याद करते हुए दामोदर आज भी भवुक हो उठते हैं। जिला टीबी व एड्स कार्डिनेटर के पद तक पहुंचने का उनका यह सफर बेहद चुनौतियों से भरा रहा है। 

चिकित्सकों ने उन्हें छह-सात महीना लगातार दवाई खाने की सलाह दी : 

चुनौती के उन दिनों की याद ताजा करते हुए दामोदर कहते हैं कि जांच में टीबी की पुष्टि होने पर चिकित्सकों ने उन्हें छह-सात महीना लगातार दवाई खाने की सलाह दी। लेकिन उनके मन में टीबी को लेकर पूर्वधारणा पहले ही बनी हुई थी कि इस रोग में रोगी का बचना मुश्किल होता है। दामोदर बताते हैं टीबी का नाम सुनते ही उनके आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। चारों तरफ से वे हताशा व निराशा से घिरा महसूस करने लगे। बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चिकित्सकों की परामर्श पर दवा लेना शुरू कर दिया। दवा के सेवन से थोड़ा बेहतर महसूस करने के बाद फिर से उन्होंने अपना सारा ध्यान पढ़ाई-लिखाई पर केन्द्रित कर दिया।

बीमारी के दौरान ही विभाग से जुड़ कर लोगों की सेवा का आया ख्याल : 

इसी दौरान उनकी मुलाकात सिंघेश्वर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के एक चिकित्सक से हुई। उन्होंने पल्स पोलिया अभियान से जुड़ने को कहा।दामोदर बताते हैं कि मैं उन दिनों स्वास्थ्य संबंधी अपनी समस्या से जूझ रहा था, लेकिन इस मौका को ठुकरा नहीं सका। बीमारी के दौरान ही स्वास्थ्य विभाग से जुड़ कर लोगों की सेवा करने की इच्छा मन में बस चुकी थी। टीबी जैसे गंभीर रोग से जूझते हुए मैंने ये तय कर लिया था कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक रोग से बचाव से जुड़ी जानकारी पहुंचा कर जितना बन पायेगा उनकी मदद करूंगा। दामोदर कहते हैं कि वे नहीं चाहते थे कि कोई दूसरा भी इस रोग से प्रभावित हो और उन्हें भी उनकी तरह चुनौतियों का सामना करना पड़े। बस यही सोच कर उन्होंने पोलियो अभियान से जुड़ने का निर्णय लिया। दूसरी बार हुए ग्लैंड टीबी के शिकार फिर भी नहीं हारी हिम्मत दामोदर बताते हैं कि पोलियो अभियान से जुड़ कर कुछ दिनों में उन्हें यह एहसास हो गया कि लोगों को होने वाली अधिकांश बीमारियों का कारण रोग के प्रति उनमें जागरूकता का अभाव है। लोगों को रोग के संबंध में उचित जानकारी व इससे बचाव के उपायों के प्रति उन्हें जागरूक कर उन्हें कई तरह की बीमारियों से बचाया जा सकता है। उसी दौरान स्वास्थ्य विभाग मधेपुरा के जिला यक्ष्मा केंद्र में एटीएस पद पर बहाली के लिये विज्ञापन पर मेरी नजर पड़ी। उक्त पद के लिये उन्होंने भी अपना फॉर्म भर दिया। दामोदर बताते हैं कि दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों उनकी तबीयत फिर बिगड़ने लगी। पूर्णिया के एक निजी क्लिनिक में इलाज के दौरान ग्लैंड टीबी होने का पता चला। चिकित्सकों ने बताया कि आपके के गले में गांठ हैं उसमें सूजन होने लगा है। 

टीबी विभाग में बहाली के बाद लगा जैसे भगवान ने मेरी सुन ली :

इस बार चिकित्सक की बात सुनकर दामोदर तनिक भी नहीं घबराये। हर तरह की चुनौतियों को मात देकर लोगों की सेवा करने का मन उन्होंने पहले ही बना लिया था। रोग से जुड़ी चुनौतियों का सख्ती से मुकाबला करते दूसरी बार टीबी को करारी शिकस्त देने में कामयाब हुए। वर्ष 2005 में एटीटीएस के पद पर उनकी नियुक्ति हुई। दामोदर बताते हैं कि ये उनके लिये किसी सौभाग्य से कम नहीं था। आखिर वह लंबे समय तक टीबी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करते रहे थे। अब उन्हें इसी विभाग से जुड़ कर लोगों की सेवा का मौका मिला था। उन्हें लगा कि मानो उनका सपना सच हो गया हो। दामोदर पूरी लगन से अपने काम को अंजाम दे रहे थे। इसी बीच वर्ष 2010 में उन्होंने तुरंत जिलास्तरीय पद पर बहाली के लिये अपना फॉर्म भरा। वर्ष 2011 में उनकी नियुक्ति जिला यक्ष्मा केंद्र अररिया में डीसी टीबी व एड्स के पद पर हुई। दामादोर को ईश्वर की मर्जी का पता चल चुका था। जो शायद उनसे यही काम कराना चाहते थे। जो दामोदर ने भी पहले से सोच रखा था। अरिरया में अपने पदस्थापना वर्ष से लेकर अब तक दामोदर पूरी तरह समर्पित होकर अपने विभाग के माध्मय से टीबी मरीजों की सेवा में जुटे हैं। दामोदर कहते हैं कि ऐसा करते हुए उन्हें जो लोगों का आशीर्वाद व स्नेह मिल रहा है यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। वे स्टेट लेबल टीम से जुड़ कर टीबी रोग से संबंधित जानकारी सभी जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने की इच्छा रखते हैं।

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