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विश्व ऑटिज्म दिवस पर जागरूकता संबंधी कई कार्यक्रम आयोजित

अररिया। मानसिक विकलांगता या ऑटिज्म किसी भी शिशु के लिये अभिशाप साबित हो सकती है। ऑटिज्म एक मानसिक रोग है। अधिकांश बच्चे इस रोग के शिकार होत...


अररिया।
मानसिक विकलांगता या ऑटिज्म किसी भी शिशु के लिये अभिशाप साबित हो सकती है। ऑटिज्म एक मानसिक रोग है। अधिकांश बच्चे इस रोग के शिकार होते हैं। आम लोगों को ऑटिज्म के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस साल विश्व ऑटिज्म दिवस का थीम “इन्क्लुशन इन द वर्कप्लेस: चैलेंजेस एंड ओपोरचुनिटी इन अ पोस्ट पैनडेमिक वर्ल्ड”रखा गया है। विश्व ऑटिज्म दिवस के मौके शुक्रवार को जिलाधिकारी के निर्देश पर जागरूकता संबंधी कई कार्यक्रम आयोजित किये गये। इस क्रम में सामाजिक सुरक्षा व बुनियाद केंद्र सहित संबंधित अन्य विभागों के माध्यम से शहर में जागरूकता रैली निकाली गयी। रैली को जिला जनसंपर्क पदाधिकारी दिलीप सरकार, सामाजिक सुरक्षा के निदेशक दिलीप कुमार, वरीय उपसमाहर्ता ओमप्रकाश ने संयुक्त रूप से हरी झंडी दिखाकर नगर भ्रमण के लिये रवाना किया। जागरूकता रैली शहर के चांदनी चौक, सुभाष चौक, काली मंदिर चौक सहित अन्य चौक-चौराहों का भ्रमण कर ऑटिज्म के प्रति आम लोगों में जन जागरूकता फैलाने के संकल्प के साथ संपन्न हुई।

कई कारणों से बच्चों को होती है ऑटिज्म से ग्रसित होने की संभावना :

ऑटिज्म के लक्षणों का समय पर पहचान कर इसका इलाज जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अमूमन रोग का कारण अनुवांशिक होता है, लेकिन रोग के लिये बच्चे का घरेलू माहौल भी जिम्मेदार हो सकता है। माता-पिता की अधिक उम्र के कारण भी बच्चों के ऑटिज्म की चपेट में आने की संभावना होती है। इसके अलावा प्रसव संबंधी जटिलता, समय पूर्व प्रसव, जन्म के समय नवजात का वजन कम होना सहित गर्भावस्था के दौरान बेहतर पोषण व उचित देखभाल की कमी भी शिशुओं में ऑटिज्म रोग की संभावनाओं को मजबूती देता है।


शुरूआती दौर में रोग की पहचान जरूरी :

ऑटिज्म रोग से संबंधित जानकारी देते हुए सिविल सर्जन डॉ एमपी गुप्ता ने बताया 12 से 13 माह के बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण उजागर होने लगते हैं। रोग से पीड़ित व्यक्ति या बच्चा दूसरे लोगों से आंख मिलाने से कतराने लगता है। दूसरे व्यक्ति की बात को न सुनने का बहाना करता है। आवाज देने पर कोई जवाब नहीं देना या अव्यवाहरिक रूप से जवाब देने के साथ-साथ माता-पिता की बातों से अहसमति रखना रोग के लक्षण हो सकते हैं। रोग से पीड़ित बच्चा दूसरों के पास अपनी बात रखने में असहज मजसूस करता है। शारीरिक संकेतों को समझने में असमर्थता, हकलाहट, अधिक समय अकेला में बिताना रोग के प्रारंभिक लक्षणों में शुमार हैं।

गर्भावती महिलाओं के स्वास्थ्य व पोषण पर विशेष ध्यान देना जरूरी : 

सिविल सर्जन डॉ एमपी गुप्ता ने बताया बच्चा स्वस्थ व सेहतमंद हो इसके लिये गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य व पोषण का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। इस दौरान उचित देखभाल के अभाव में गर्भस्थ शिशु के मानसिक व शारीरिक विकास प्रभावित होने की संभावना नही होती है। इससे रोगग्रस्त शिशु के जन्म लेने की संभावना रहती है। इसलिये गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को प्रोटीन, आयरन, फॉलिक एसिड व प्रचुर मात्रा में कैल्शियम युक्त आहार लेने के लिये प्रेरित किया जाता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान फॉलिक एसिड के नियमित सेवन से नवजात को ऑटिज्म से काफी हद तक बचाया जा सकता है।

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